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नोटबंदी के विरोध के घिसे-पिटे तर्क

Posted on July 5, 2022July 5, 2022 by Dr Devendra Kumar

केवल दुर्भावनावश ही सरकार को कोसते रहने को लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा कैसे माना जा सकता है?

लोकतंत्र में सरकार की आलोचना का सबको अधिकार है, लेकिन बिना तार्किक आधार केवल दुर्भावनावश ही सरकार को कोसते रहने को लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा कैसे माना जा सकता है? रिजर्व बैंक की प्रतिबंधित नोटों की संख्या बताने वाली रिपोर्ट आने के बाद समाज का एक वर्ग फिर से सक्रिय हो गया है। ये वही लोग हैं जिन्होंने बीते साल आठ नवंबर को एक हजार और पांच सौ रुपये के नोटों को बंद करने की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। इन तमाम लोगों की आलोचना में तर्क कम और मोदी सरकार के प्रति पूर्वाग्रह और राजनीतिक प्रपंच अधिक था। रिजर्व बैंक की ताजा रिपोर्ट आने के बाद यह वर्ग फिर उसी पुराने घिसे-पिटे और आधारहीन तर्कों के साथ मुखर हो गया है।


आलोचना करने वाले इस वर्ग को इतना ज्ञान अवश्य होना चाहिए कि किसी भी फैसले की सफलता या विफलता का आकलन हमेशा एक वृहत परिप्रेक्ष्य में किया जाता है। कौन सा फैसला किन परिस्थितियों के तहत लिया गया है यह देखना बेहद जरूरी है। यदि निर्णय किसी नीति से संबंधित है तो उसके समानांतर चलने वाली नीतियां और उनका प्रभाव भी एक व्यापक आकलन का हिस्सा बनती हैं। जहां तक नोटबंदी का प्रश्न है इसका मुख्य उद्देश्य भ्रष्टाचार और अनैतिक तरीके से कमाए गए धन पर नियंत्रण करना था। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए नोटबंदी के साथ-साथ कई दूसरे नीतिगत फैसले भी लिए गए। नोटबंदी का निर्णय देश में कालेधन के सृजन को रोकने की प्रधानमंत्री की वृहत नीति का एक हिस्सा ही था। इसलिए 99 प्रतिशत प्रतिबंधित नोट बैंकों में आ गए सिर्फ इसी एक तथ्य के आधार पर नोटबंदी के निर्णय को विफलता करार नहीं दिया जा सकता है?


सवाल यह है कि बैंकों में वापस आया पैसा बैंक में जमा होने के बाद क्या सफेद हो गया? जिन लोगों ने यह पैसा जमा कराया क्या वे दोषमुक्त हो गए? बिल्कुल नहीं। वे सभी लोग जिन्होंने अपनी आय से अधिक का धन अपने बैंक खातों में बिना किसी ठोस वजह बताए जमा कराया उनके खातों पर सरकार की नजर है। ऐसे एक लाख से भी अधिक बैंक खाते जांच के घेरे में हैं और अनुमान लगाया जा रहा है कि इन खातों में डेढ़ लाख करोड़ रुपये से भी अधिक का धन काला है। इसी जांच की कड़ी में पिछले महीने 30 हजार ऐसे लोगों को चिन्हित किया गया जिन्होंने नोटबंदी के बाद अपनी आय के आंकड़ों में भारी फेरबदल करके आयकर रिटर्न भरे। उम्मीद की जाती है कि जल्द ही जांच एजेंसियों का शिकंजा ऐसे लोगों पर कसेगा।


इसी के साथ हमें मोदी सरकार द्वारा देश भर में बेनामी संपत्ति पर शिकंजा कसने के लिए लाए गए नए कानून को भी मद्देनजर रखना चाहिए। मोदी सरकार ही इस कानून को संसद में लाई और पारित कराया। ताजा आंकड़ों के अनुसार अब तक सरकार ने देश भर में 14000 ऐसी संपत्तियों को चिन्हित किया है जो कि एक करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की हैं और इनकी खरीद-फरोख्त करने वाले आयकर के दायरे में नहीं हैं। अनुमान है कि इनकी जांच के बाद हजारों करोड़ रुपये का काला धन सामने आएगा।


अब सरकार के इस निर्णय का अन्य सकारात्मक पहलू भी देखिए। बैंकों में जमा धन के जरिये देश की औपचारिक अर्थव्यवस्था में लाखों करोड़ रुपये वापस आए हैं। इसका लाभ यह हुआ है कि बैंकों के खजाने में धन की वृद्धि हुई है। इससे बैंकों के पास कर्ज देने के लिए अतिरिक्त धन जमा हो गया है। अब वे कम ब्याज में अधिक ऋण दे सकेंगे। घटी हुई ब्याज दरों पर मिले कर्ज से जहां अधिक उद्यम लगेंगे और देश के युवा वर्ग के लिए लाखों नए रोजगार सृजित होंगे, वहीं दूसरी ओर आम जनता को सस्ता आवास ऋण उपलब्ध होगा। संभवत: इसे नोटबंदी का ही असर माना जाना चाहिए कि मोदी सरकार ने गरीबों के लिए बहुत ही निम्न ब्याज और आसान किस्तों में घर के लिए सब्सिडी आधारित ऋण की व्यवस्था की है। बाजार में नगदी के रूप में काला धन कम होने से जमीनों और मकानों की कीमतों में तेजी से गिरावट आने और मजबूत रियल एस्टेट कानून बनने से अब माध्यम वर्ग के लोगों का अपना मकान होने का सपना पूरा हो सकेगा।


देश के आयकर कानून का सम्मान करते हुए अपनी सही आय को घोषित करके उचित कर देना व्यवस्था के अतिरिक्त मनोविज्ञान का भी विषय है। स्वतंत्रता के बाद खासकर नब्बे के दशक में हुए उदारीकरण से जब लोगों की आय में भारी बढ़ोतरी हुई तब कर की चोरी करना और काले धन का संचय करना आमजन की मानसिकता बन गई। इस मानसिकता का मुख्य कारण ऊपर से नीचे तक व्याप्त भ्रष्टाचार था, परंतु मोदी सरकार के आने के बाद जिस तरह से नए कानून बने हैं और उनको सख्ती से लागू किया जा रहा है उससे भ्रष्टाचारियों और कर चोरों के मन में एक तरह का भय उत्पन्न हुआ है। यही कारण है कि करदाताओं की संख्या तो बढ़ी ही है साथ ही साथ पुराने करदाता अब अपनी असली आय घोषित करने के लिए भी मजबूर हो रहे हैं। ताजा आंकड़ों अनुसार 90 लाख से भी अधिक लोग इस वर्ष नए करदाता बने हैं। आर्थिक मापदंडों को छोड़ भी दें तो जनता ने इस निर्णय के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारी समर्थन दिया है। नोटबंदी के तुरंत बाद हुए कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को भारी सफलता मिली।
दरअसल नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश के लोगों की आकांक्षाएं तेजी से बड़ी हैं। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में काम करने योग्य जनसंख्या संपूर्ण विश्व में सर्वाधिक तेजी से बढ़ रही है, परंतु पिछले छह वित्तीय वर्षों में भारत का योजनागत व्यय लगातार चार से पांच लाख करोड़ रुपये के बीच ही झूल रहा है। अत: जन आकांक्षाओं को पूरा करने और भारत को सच्चा लोकहितकारी राष्ट्र बनाने के लिए संघ सरकार को अपनी आय में भारी वृद्धि करनी होगी ताकि जन कल्याण से जुड़ी नई योजनाएं बनाई जा सकें। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए राजनीति की चिंता किए बिना सरकार को कठिन फैसले भी लेने पड़ेंगे, नोटबंदी शायद ऐसा ही एक कठिन फैसला था।
इस संदर्भ में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह सच ही कहा करते हैं कि मोदी सरकार मन लुभाने वाले नहीं, बल्कि आमजन के हित में फैसले लेती है।

Published on Jagran.com | 04 September 2017

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Dr. Devendra Kumar has done M.Phil/Ph.D. from JNU & Masters from Delhi School of Economics. He has over three-decade experience in Development Research. He has also enriched political research in India by devising several tools of Election Prediction. He has been a prolific columnist and has been regularly writing in leading newspapers and portals. For almost a decade he is associated with Bharatiya Janta Party and is working closing working with its top leadership.

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